कामरेड से बातचीत: भवानीपुर भूमि संघर्ष – आशु

(कामरेड से बातचीत, छोटे-बड़े कम्युनिस्ट आंदोलनों में शामिल कार्यकर्ताओं के संस्मरण और अहम घटनाओं को दस्तावेज के रूप में इकट्ठा करने का प्रयास है। यह घटनाएं भले ही वृहद आंदोलनों की दृष्टि से सूक्ष्म लगे लेकिन ऐसी घटनाएं कार्यकर्ताओं के लिए आजीवन प्रेरणा के स्त्रोत बने रहते हैं।)

कॉमo विजय कान्त ठाकुर (पूर्वपार्टी सचिव, बिहार राज्य) अपनी पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)की भूमि संघर्ष के समझ कोलेकर कहा करते थे “भूमि संघर्ष यद्यपि एक बुर्जुआ संघर्ष है, लेकिन एक पूंजीवादी लोकतंत्र में बहुत मायने रखता है| भूमि संघर्ष एक बहुत ही कठिन संघर्ष है क्योंकि यह महज जमीन पर कब्ज़ा करने के साथ ही खत्म नहीं हो जाता| इस कब्जे को बरक़रार रखने के लिए आजीवन संघर्ष करना पड़ता है|”

1991-92 के अंत में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने भूमि संघर्ष का फैसला किया जिसमें गरीब भूमिहीनों को सरकार द्वारा घोषित सीलिंग/सरप्लस/अतिरिक्त जमीन जिसका पट्टा उन्हें निर्गत किया है, लेकिन समंतवादियों के कब्जे से निकाल कर भूमिहीनों को सौंपा नही गया पर कब्ज़े की बात हुईथी। दरभंगा जिला कमीटी नेकई चरणों में यह संघर्ष किया और काफी सारी जमीनों पर भूमिहीनों को कब्ज़ा दिलाया| यहाँ के कई संघर्षों में भवानीपुर भूमि संघर्ष बहुत महत्वपूर्ण है|

untitled1

भवानीपुर, दरभंगा जिला मुख्यालय से करीब 30 किoमीo दूर, सिंहवाड़ा प्रखंड में एक छोटा सा गांव हैं| यहाँकलगाँव (दरभंगा जिला के ही एक और पंचायत) केपूर्व जमींदार यदुवीर झा कीकुछ 16 एकड़ जमीन सरप्लस जमीन थी, जिसको बिहार सरकार ने 1984 में भूमिहीनों को वितरित किया था| मगरइस जमीन पर गांव के सामंतों ने कब्जा कर रखा था| दरभंगाजिलाकमिटी ने कॉम० विजयकांत ठाकुर के नेतृत्व में इस पर कब्जे का फैसला लिया|

इस काम का जिम्मा सौंपा गया दो नए कॉमरेड को, जो अभी-अभी हाल में माकपा में शामिल हुए थे। ये दो कॉमरेड थे, कॉम० अविनाश कुमार (मंटू) ठाकुर (निवर्तमान दरभंगा जिला सचिव, माकपा) और कॉम० महेश दुबे (निवर्तमान दरभंगा जिला कमिटी सदस्य, माकपा)। हालांकि माकपा में ये कॉमरेड नए थे, लेकिन छात्र जीवन से ही वह इस क्षेत्र की राजनीति और समस्याओं से वाकिफ थे। यहाँ पर उन्होंनेगरीब-मजदूर वर्ग को संगठित करने में उन्होंने काफी वक्त बिताया था और विभिन्न वामपंथी संगठनों के संपर्क में रह चुके थे|

इन्हीं दोनों साथियों के नेतृत्व में भूमिहीनों ने इस जमीन पर लाल झंडा गाड़कर अपने कब्जे की घोषणा कर दी। संवेदनशील माहौल होने के बावजूद कुछ लोगों ने इस जमीन पर झोपड़ियाँ भी बना ली|हालांकि जमीन पर भूमिहीनों ने कब्जा कर लिया था, मगर संघर्ष की खूनी रात अभी आनी बाकी थी।

30 मई 1993 को यह रात भी आई। पहला हमला जमींदार के गुंडों की तरफ से शाम 5.30 बजे हुआ जब कॉम० मंटू ठाकुर वहाँ सभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने उस सभा पर बम फेंका जिसमें एक साथी, कॉम० छोटू ठाकुर बुरी तरह घायल हो गए। उनके कान, पीठ और चेहरे के एक तरफ बम के छींटे आकर लगे। इसी अवस्था में वह मध्य-रात्रि तक मोर्चे पर डटे भी रहे| जब उनकी हालत और ख़राब हो गयी तब उनको वहां सेनिकाल कर रात में ही अस्पताल ले जाया गया|

हमले काजवाब मजदूर वर्ग ने ईंट, पत्थरों और लाठियों से दिया। दोनों ओर मोर्चे बन गए। सामंत गोली चलाते रहे, बम फेंकते रहे और गरीब भूमिहीन उसका जवाब पत्थरों से देते रहे। यह मोर्चा रात 2 बजे तक बना रहा|

पुलिस एवं प्रशासन को बार-बार भेजे गए खबरों के बावजूद 2 बजे तक कोई पुलिसकर्मि या थाना मौके पर नहीं पहुँचा। इस बीच सुबह से पहले मामला खत्म करने के चक्कर में सामंतों के हमले तेज हो रहे थे और उनकी हताशा भी जाहिर हो रही थी।

इसी बीचआम राय से, पुलिस का ध्यानाकर्षण के लिए और आत्मरक्षा के लिए भूमिहीनों ने अपनी झोपड़ियों में आग लगा ली। जब तक पुलिस आई, तब तक आधा दर्जन से ज्यादा झोपड़ियाँ राख हो चुकी थी। 12-15 लोग जख्मी थे।।

इस मुठभेड़ में मिली विफलता को सामंतवादी पचा नहीं पाए|1 जून 1993 को जबकॉम० विजयकांत ठाकुर आम सभा को संबोधित करने भवानीपुर पहुँचे। तबउनपर भीसामंतों का जानलेवा हमला हुआ लेकिन मज़दूर वर्ग की चौकसी के कारण उनकी हत्या की कोशिश नाकाम कर दी गई।

अगले दिन, 2 जून 1993 को अपनी नाकामियों से बौखलाए सामंतों ने चार साथियों के दल जो एक दुकान परचर्चा में व्यस्त थे ,पर बम से हमला किया। एक बम कॉम० राम शरण चौपाल के सीने पर जा लगा, जिससे उनकी मौत मौके पर ही हो गई। बाकि तीनों साथी भी गंभीर रूप से घायल हो गए| घायल होने वालों में स्थानीय मजदूर नेता रामचंद्र चौपाल भी थे|

इस हत्या के बाद क्रोधित मज़दूर वर्ग ने पुलिस और प्रशासन को हत्यारों, सामंतों पर दबिश बनाने को मजबूर किया। मजदूर वर्ग और उनकी पार्टी के संघर्षों के परिणामस्वरुपयह सरप्लस जमीन आज भी भूमिहीनों के कब्जे में है| हालाँकि, राज्य-व्यवस्था के अंतर्गत यह मामला अब भी न्यायलय में ही है और उस जमीन का पट्टा अभी भी कब्जाधारकों को उपलब्ध नहीं कराया गया है|

भवानीपुर का यह संघर्ष लोगों के जेहन में आजतक ताजा है। यह संघर्ष मज़दूर वर्ग के साहस, लड़ने की क्षमता, संकल्प, दृढ़ निश्चय और बलिदान का अनोखा उदाहरण है जिसे याद रखना ही हमें प्रेरणा देता रहेगा।

मजदूर वर्ग के गुस्से और साहस को नेरुदा की इन पंक्ति से समझा जा सकता है:

“कहो तुम अदालत पे जाने से पहले

कहोतुमवज़ारत पेजाने से पहले

कहो तुम सफ़ारत पे जाने से पहले

दिखाओ हमें अपने आमाल नामे

क़यामत के दिन और ख़ुदा पर न छोड़ो

क़यामत से ये लोग डरते नहीं हैं

इसी चौक पर खून बहता रहा है

इसी चौक पर कातिलों को पकड़ के सज़ा दो

सज़ा दो सज़ा दो सज़ा दो”

 

(नेरुदा की कविता का अनुवाद: प्रकाश के रे)

(कॉम० अविनाश कुमा (मंटू) ठाकुर से बातचीत के आधार पर..)

One comment

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s