2019 में लड़ाई मोदी बनाम जनता की है : प्रदीप शर्मा

प्रदीप शर्मा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की लखनऊ जिला कमेटी के सचिव और उत्तर प्रदेश राज्य कमेटी के सदस्य हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले बदलते राजनितिक घटनाक्रमों पर उन्होंने हाल ही में महत्वपूर्ण टीपें लिखी हैं। Socialist India  उन टीपों को एक लेख की शक्ल में यहाँ छाप रहा है।

मोदी सरकार पूरी तरह से असफल सरकार साबित हुई है, जिसके चलते आज जनता के बीच अपना भरोसा खो चुकी है। मोदी सरकार के साथ भाजपा की राज्य सरकारें भी पूरी तरफ असफल साबित हो रही हैं। वो राज्य जहाँ  इनकी पुरानी ससरकारें हैं आज वहां भी इनकी जनविरोधी नीतियों के चलते जनता में व्यापक विरोध है । जहाँ नई सरकारें  बनी हैं वो भी पूरी तरफ विफल हैं, चाहे उत्तर प्रदेश हो , हरियाणा हो या नीतीश के साथ सांझी बिहार सरकार । किसान , मज़दूर, छात्र , नौजवान सबमे बेहद नाराजगी है वो निकल कर सड़क पर आ रहे हैं, उनका गुस्सा धीरे धीरे आक्रोश में बदल गया है ।
इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह प्रतिरोध खुद जनता और जनता के विभिन्न संगठनों द्वारा संचालित है-  इसमें वाम को छोड़कर प्रमुख विपक्षी पार्टियों की कोई भूमिका नही है। यह बात भाजपा भी पूरी तरह समझ गयी है कि उसने आम जनता के लिए कोई काम नही किया है ,सारे वादे झूठे साबित हुए है तो जनता उनको इस बुरी परफॉरमेंस के बाद दोबारा 5 साल मौका नही देने वाली इसलिए पूरी कोशिश है कि राम मंदिर का मुद्दा बढ़ाया जाए , मूर्ति का सवाल चलाया जाए जिससे जनता को हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर गुमराह करके किसी तरह दोबारा सत्ता हासिल कर लें ।
हमे याद है कि 90 के दशक में किस तरह मीडिया ने राम मंदिर पर लोगो को लामबंद करने में भाजपा और संघी गिरोह की मदद की थी । आज फिर वो कोशिशें साफ देखी जा रही है , महत्वहीन से महत्वहीन बयान को अखबार ही हैडिंग में मोटे फॉन्ट के साथ छापा जा रहा है । चैनल पर लगातार माहौल बनाया जा रहा है लेकिन जनता में इसका इस बार कोई असर नही क्योंकि लोग समझ रहे हैं कि यह एक सोची समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है जिससे भाजपा अपनी असफलताएं छुपा लें।

 

काठ की हांडी बार बार आंच पर नही चढ़ती
इस पूरे माहौल में हमे दो और बातें ध्यान रखनी चाहिए राम मंदिर की इनकी साजिशों में जनता तब तक शामिल हुई जनता इनके द्वारा नफरत के प्रतीक के तौर पर स्थापित कर दी गयी बाबरी मस्जिद को ढहा नही दिया गया था , उसके बाद से लोगो में साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने और उसके जुनून पर उन्हें लामबद्ध करने की इनकी कोशिशें असफल ही होती आईं है , इस बार भी असफल ही होंगी ।
इस मौके पर सभी विपक्षी ताकतों की ज़िम्मेदारी है कि वो इनकी जनविरोधी नीतियों, कॉर्पोरेट की दलाली , घोटाले पर जनता के बीच पूरी ताकत से जुट जाएं और इनके मंदिर के सवाल को कोई महत्व ही न दें यही संजीदगी तमाम सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगो को करना चाहिए , मंदिर अभियान को कोई महत्व ही नही दीजिये। यह मुद्दा पिट चुका है , ऐसा होने से इनकी यह कोशिश भी नाकामयाब साबित होगी। विपक्ष की एकता , जनविरोधी नीतियों पर जन अभियान को तेज करना और वैकल्पिक कार्यक्रम जनता के सामने रखना इनकी हार सुनिश्चित करेगा।

लेफ्ट की अहम भूमिका

2014 के बाद लेफ्ट के संघर्ष की दिशा ने एक बार फिर साबित किया है कि यह संघर्ष वर्गीय था , और रहेगा , विचार अच्छा तभी साबित हो जब विचार को मानने वाले अपने पर भरोसा करके विचार के आधार पर संघर्ष से रास्ता बनाएं और शक्ति हासिल करें । आज 2019 की आहट हमे सही साबित करती है कि जनता के संघर्ष का ही विकल्प है । आज किसान , मज़दूर, महिलायों, दलितों , आदिवासियों, छात्रों , युवायों , बुद्धिजीवियों के साथ तमाम सामाजिक संगठनों के आंदोलन ने न सिर्फ मोदी सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया है वरन यह भी तय कर दिया है कि 2019 में बनने वाली गैर-भाजपा सरकार को जनमुखी, मेहनतकश अवाम के संघर्ष के मुद्दों को शामिल करते हुए नीति बनानी ही होगी , और हमे इस संघर्ष को औऱ तेज़ करना होगा ।

 

मोदी सरकार 2014 में जो वादे करके सत्ता में आई थी ,वो वादे जनता के लंबे संघर्ष के नारे थे । मेहनतकश अवाम उन नारों को लेकर एक लंबे समय से संघर्ष कर रही थी, भाजपा ने केवल उन नारों को चुनावी जुमला बना लिया । सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार उन वादों को भूल गयी और पूरी तरह कॉर्पोरेट की सेवा में लग गयी और आर्थिक उदारीकरण को बेशर्मी से लागू करने में घोर जनविरोधी फैसले लेती गयी जिससे जनता में बेहद जन असंतोष व्याप्त है।
मोदी सरकार की इन जनविरोधी नीतियों के खिलाफ वामपंथी पार्टियों, छात्रों , किसानों, मज़दूरों,महिलायों , साहित्यकारों ,सामाजिक आंदोलन के संगठनों ने ज़मीन से लेकर वैचारिक स्तर पर संघर्ष किया जिसके चलते मोदी सरकार बैकफुट पर गयी। वाम के अलावा विपक्ष ने ज़मीन पर उतर कर मोदी सरकार का मुकाबला नही किया, इधर पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस द्वारा कुछ प्रतीकात्मक शुरुयात हई है । मोदी सरकार द्वारा जनविरोधी नीतियों, नफरत की राजनीति, लोकतंन्त्र विरोधी कार्यों को रोकने के लिए 2019 एक ऐतिहासिक पड़ाव है । यह कोई सामान्य चुनाव नही है , बल्कि यह चुनाव देश का भविष्य तय करेगा कि देश में लोकतंन्त्र, धर्मनिरपेक्षता रहेगी या अपना अस्तित्व खो देगी ।
उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा दोनों प्रमुख पार्टियां अपनी पुरानी गलतियों को दोहरा रहे है । केवल चुनावी गठबंधन से भाजपा को हराना मुश्किल होगा क्योंकि उसके पास झूठ और फरेब की फैक्ट्री है ,जिसका मुकाबला करने के लिए जमीन से लेकर वैचारिक स्तर तक मुकबला करना होगा । सपा और बसपा को इस समय मोदी सरकार के खिलाफ जनता में असंतोष को और तीखा रूख देने के लिए तत्काल ज़मीनी संघर्ष पर उतरने की ज़रूरत है
जो भाजपा को हराना चाहते है उनको जनता के सामने वैकल्पिक कार्यक्रम रखना होगा । पहली प्राथमिकता साम्प्रदयिक और जनविरोधी भाजपा को सत्ता से बेदखल करना होना चाहिए वहीं जनता के कुछ  बुनियादी मुद्दों को ठोस रूप में सामने लाना ही होगा । स्पष्ट रूप से कुछ बिंदु जो वैकल्पिक कार्यक्रम में होने चाहिए:
●पुरानी पेंशन की बहाली ।
●किसानों के कर्जे माफ, उपज का  डेढ़ गुना दाम ।
●रोज़गार पर लगी रोक हटाई जाए, नए रोज़गार सृजित किये जायेंगे।
● मजदूरों को 18000 न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित की जाएगी ।
●सबको सस्ते राशन के लिए खाद्य सुरक्षा कानून को लागू किया जाएगा।
●पेट्रोल , डीजल , गैस के दामो में कमी के लिए उस पर बढ़ा टैक्स ख़त्म किया जाएगा।
●पशु विक्रय कानून में बदलाव , पशुयों से फसल की सुरक्षा के लिए उपाय ।
●दलित ,अल्पसंख्यक, आदिवासी , महिलायों और अन्य वंचित तबकों पर बढ़ते हमलों को कड़ाई से रोका जाएगा, उनकी अधिकारों की रक्षा और उनकी सुरक्षा के लिए उपाय किये जायेंगे।
●सभी शिक्षण संस्थायों में अभिव्यक्ति की आज़ादी और लोकतंन्त्र कि बहाली की जाएगी ।

अगर ऐसा करते हैं तो यह तय जानिए की 2019 में भाजपा उत्तर प्रदेश में दहाई में नही पहुंचेगी । उत्तर प्रदेश के इस नुकसान की भरपाई भाजपा पूरे देश से नही कर सकती । 2019 के इस महत्व को समझ कर चुनावी गठबंधन के आगे बढ़कर सपा और बसपा को जमीनी स्तर पर उतरना चाहिए वर्ना भाजपा को मौका देने का खामियाजा इनको उठाना पड़ेगा ।

इस बार मोदी बनाम जनता का संघर्ष है 2019 की दिशा इस से ही निकलेगी।

 

 

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