Going टू शिमला : शिमला डायरी – 1 : उत्कर्ष

देश के सबसे बड़े जनवादी छात्र संगठन SFI का अखिल भारतीय सम्मलेन शिमला में शुरू हो चुका है । उत्कर्ष इस सम्मलेन में डेलिगेट हैं। उनके अनुभवों को Socialist India डायरी की शक्ल में छाप रहा है।

 

दिल्ली के कश्मीरी गेट बस अड्डे से ही पूरे उत्तर भारत के लिए बसें चलती हैं।  अखिल भारतीय सम्मलेन के लिए दिल्ली के हम डेलीगेटों को यहीं से शिमला की बस लेनी थी।  रात के 10-11 बज रहे थे।  पूरे बस अड्डे पर हरियाणा रोडवेज की हड़ताल की गूँज सुनी जा सकती थी।  और, यह हो भी क्यों न ? आखिरकार ये पूरे उत्तर भारत में सड़क परिवहन की रीढ़ की हड्डी जो ठहरे।  हवा से बातें करती इनकी बसें, हरित क्रांति की पौध ग्रामीण परिवेश से निकले इनके मनमौजी ड्राइवर और फक्कड़ कंडक्टर – आखिर इन सफ़ेद-नीली बसों के टक्कर का है कौन ? पिछले 15 दिनों से हरियाणा रोडवेज के कर्मचारी हड़ताल पर हैं और वे हड़ताल पर अपनी किसी आर्थिक मांग के लिए नहीं है , वेतन बढ़ोतरी के लिए नहीं हैं , न ही किसी और सुविधा के लिए हैं।  वो लड़ रहे हैं उत्तर भारत के सड़क परिवहन की रीढ़ की हड्डी , उन सफ़ेद-नीली बसों को निजीकरण के प्रेतों से बचाने के लिए , उन आदमखोर पूँजी के दलालों के खिलाफ है उनकी लड़ाई , जनता के हितों में अपने आप को स्वाहा करने की है उनकी लड़ाई।

बस अड्डे पर चाय- गरम पेटीज – किताब- मोज़े- चिप्स-कोल्डड्रिंक बेचने वाले , बाकी बसों के कंडक्टर-ड्राइवर और टिकट काटने वाले , मुसाफिर – सब की बातों में उनके हिम्मत के ही चर्चे थे।  हम अपनी बस का इंतज़ार कर रहे थे और अपने आस-पास की बातचीत सुन मैं यही सोच रहा था कि हम शिमला में जिस लड़ाई को तेज़ करने के इरादे से जुड़ रहे हैं , वह इन रणबांकुरों की लड़ाई का ही तो हिस्सा है।  शिक्षा बचाने की लड़ाई , सार्वजनिक परिवहन बचाने की लड़ाई , खेती-किसानी की लड़ाई , दिहाड़ी-मज़दूरी की लड़ाई – उस थोड़े से अर्से में ही  SFI के कार्यक्रम में जो थोड़ा बहुत अब तक समझ सका था, वो एकदम साफ़ सा हो गया , बिलकुल वैसा जैसे मानसूनी थपेड़ों से हिलते आसमान में चमकती  है साफ़ कौंध-कड़क बिजली की।  और, क्या है वो समझ? वो समझ वही है जिसके लिए इस देश के जनवादी छात्र आंदोलन ने बड़ी कुर्बानियां दी और हर तरह के वैचारिक भटकावों का मुकाबला किया। . यह समझ कहती है कि छात्रों की बुनियादी मांगों पर एक बनाते हुए, लड़ाईयां लड़ते हुए , आगे बढ़ते हुए , हर कदम पर यह बात स्थापित करना की छात्र आंदोलन वृहद्तर जनवादी आंदोलन का अभिन्न हिस्सा है।  यही समझ छात्र आंदोलन को अपनी उस भूमिका के लिए तैयार करती है, जो इसकी ऐतिहासिक जिमेदारी है।

खैर, हमारी बस रवाना हुई।  अक्टूबर के अंत में हवा में जैसी ठण्ड होती है वैसी  ही ठण्ड पसरी हुई थी चारों ओर , और बस के बंद शीशों के बावजूद ठण्ड का साम्राज्य फैला  हुआ था पूरी बस में। लगभग सफी यात्री सोये हुए थे और बस जीटी करनाल रोड पपर हवा को चीरती हुई आगे बढे जा रही थी।  चण्डीगढ़ के आसपास बस कुछ देर के लिए रुकी, पर अधिकतर लोग अलसाये से बस में पड़े रहे।  कुछ घंटे में बस हिमाचल की सीमा पर थी।  हिमाचल के साथियों के महीनों के मेहनत बॉर्डर पार करते ही हमें दिखने लगी।  परवाणु की पुलिस चौकी के साथ ही टंगी हुई थी एक होर्डिंग जिसमें मज़दूरों का संगठन सीटू सम्मलेन  में आ रहे सभी डेलीगेटों का स्वागत कर रहा था।  आगे चल कर हर १५०-२०० मीटर पर चटख लाल-नीले-पीले-हरे में दीवारों पर नारे लिखे हुए थे।  रात का धुंधलका अभी छटा नहीं था , सुबह की पौ फटनी अभी बाकी थी।  पर, इसके बावजूद मेहनत-लगन-जूनून- और हिम्मत जो इस अखिल भारतीय सम्मलेन की तैयारी में लगी थी उसे देखने के लिए किसी रौशनी की जरुरत नहीं होती, वो तो रात  के अँधेरे में सच्चाई सी चमकती है।

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    देश के सबसे बड़े जनवादी छात्र संगठन SFI का अखिल भारतीय सम्मलेन शिमला में शुरू हो चुका है । उत्कर्ष इस सम्मलेन में डेलिगेट हैं। उनके अनुभवों को Socialist India डायरी की शक्ल में छाप रहा है।
    “बस अड्डे पर चाय- गरम पेटीज – किताब- मोज़े- चिप्स-कोल्डड्रिंक बेचने वाले , बाकी बसों के कंडक्टर-ड्राइवर और टिकट काटने वाले , मुसाफिर – सब की बातों में उनके हिम्मत के ही चर्चे थे। हम अपनी बस का इंतज़ार कर रहे थे और अपने आस-पास की बातचीत सुन मैं यही सोच रहा था कि हम शिमला में जिस लड़ाई को तेज़ करने के इरादे से जुड़ रहे हैं , वह इन रणबांकुरों की लड़ाई का ही तो हिस्सा है। शिक्षा बचाने की लड़ाई , सार्वजनिक परिवहन बचाने की लड़ाई , खेती-किसानी की लड़ाई , दिहाड़ी-मज़दूरी की लड़ाई – उस थोड़े से अर्से में ही SFI के कार्यक्रम में जो थोड़ा बहुत अब तक समझ सका था, वो एकदम साफ़ सा हो गया , बिलकुल वैसा जैसे मानसूनी थपेड़ों से हिलते आसमान में चमकती है साफ़ कौंध-कड़क बिजली की। और, क्या है वो समझ? वो समझ वही है जिसके लिए इस देश के जनवादी छात्र आंदोलन ने बड़ी कुर्बानियां दी और हर तरह के वैचारिक भटकावों का मुकाबला किया। . यह समझ कहती है कि छात्रों की बुनियादी मांगों पर एक बनाते हुए, लड़ाईयां लड़ते हुए , आगे बढ़ते हुए , हर कदम पर यह बात स्थापित करना की छात्र आंदोलन वृहद्तर जनवादी आंदोलन का अभिन्न हिस्सा है। यही समझ छात्र आंदोलन को अपनी उस भूमिका के लिए तैयार करती है, जो इसकी ऐतिहासिक जिमेदारी है।”
    https://blogsocialistindia.wordpress.com/2018/10/30/going-to-shimla-shimladiaries-1-utkarsh/

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