कांचा इलैया की किताबों से किसे डर लगता है? : सैकत घोष

 

दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा राजनितिक विज्ञान के पोस्टग्रेजुएट सिलेबस से कांचा इलैया की किताबों को हटाने के फैसले पर विश्वविद्यालय के अकादमिक कौंसिल के चुने हुए सदस्य सैकत घोष द्वारा जारी किए गए बयान का हिंदी अनुवाद Socialist India छाप रहा है।

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यह दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे देश के उत्कृष्ट विश्वविद्यालयों में आरएसएस की निति पर चलने वाले मौजूदा निज़ाम के लगातार बढ़ते हुए हस्तक्षेप का ही निराशाजनक परिणाम है कि अकादमिक कौंसिल की स्टैंडिंग कमेटी ने राजनितिक विज्ञान के पोस्टग्रेजुएट सिलेबस से कांचा इलैया की किताबों को हटाने की सिफ़ारिश की है। इतना ही नहीं इस कमेटी ने कांचा को हिन्दू- विरोधी बताया है तथा अकादमिक बहसों , शिक्षण और पठन-पाठन में ‘ दलित ‘ शब्द के इस्तेमाल पर ही रोक लगा दी है। अकादमिक कौंसिल में शिक्षकों के चुने हुए प्रतिनिधि के नाते मैं स्टैंडिंग कमेटी के इस फैसले के खिलाफ अपना तीव्र विरोध दर्ज करता हूँ। मेरा विरोध इन कारणों से है :
1. देश में सदियों से चली आ रही जाति व्यवस्था के चलते जिन समुदायों को शोषण का सबसे अधिक सामना करना पड़ा है, उनकी राजनीती , राजनितिक आंदोलनों और संस्कृति के अध्ययन  में ‘ दलित ‘ शब्द अकादमिक रेफेरेंस का एक स्थापित शब्द है। कानून के किसी भी कोर्ट ने इस शब्द के इस्तेमाल पर रोक नहीं लगाया है। सुप्रीम कोर्ट ने महज सरकारी संस्थानों को सरकारी नीतियों से सम्बंधित आधिकारिक पत्राचार में दलितों को एससी कहने का निर्देश जारी किया है क्योंकि ‘ शेड्यूल्ड कास्ट ‘ न्यायिक-कानूनी शब्द है। इसका मतलब कतई नहीं है कि हम अकादमिक और बौद्धिक विमर्शों में दलित शब्द का इस्तेमाल करना बंद कर दें। जो लोग सुप्रीम कोर्ट के हवाले से इस शब्द पर रोक लगाने की गुहार लगा रहे हैं वो जानबूझ कर अकादमिक समुदाय और विश्वविद्यालय के अधिकारीयों को गुमराह करने का काम कर रहे हैं।
2. कांचा इलैया दलित राजनीति और दर्शन के क्षेत्र में एक माने हुए स्कॉलर और विचारक हैं। ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म की उनकी दार्शनिक आलोचना को महज हिन्दू-विरोधी करार करके सीमित नहीं किया जा सकता है। अगर ऐसा होता , तो हमारे संविधान और दंड संहिता में किसी भी धर्म की अवमानना करने वाली बात पर कार्रवाई के उचित प्रावधान हैं। किसी भी सरकार या कोर्ट ने अब तक कांचा इलैया को हिन्दू धर्म को ठेस पहुंचाने का दोषी नहीं पाया है। कोई दार्शनिक आलोचना अवमानना नहीं होती। अकादमिकों को इस अंतर के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।

3 . स्टैंडिंग कमेटी के पास किसी विषय के विशेषज्ञों द्वारा बनाये गए सिलेबस से किसी भी किताब को हटाने के लिए जरुरी वैषयिक दक्षता नहीं है। वह राजनितिक विज्ञान विभाग से कांचा इलैया के किताबों के अकादमिक मूल्य के बारे में स्पष्टीकरण मांग सकती थी , पर वह खुद उनकी किताबों को पढ़ाने के फायदे-नुक्सान के बारे में फैसला नहीं कर सकती। अफ़सोस है कि स्टैंडिंग कमेटी ने इस मामले में अपने दायरे से बढ़ने का काम किया है।

4. अकादमिक काउंसिल और एग्जीक्यूटिव कौंसिल में मौजूद आरएसएस से जुड़े हुए शिक्षक कांचा इलैया, क्रिस्टोफर जफ्फरलॉट या अन्य ऐसे किसी भी विचारक या स्कॉलर हमला कर रहे हैं जिन्होंने आरएसएस या हिंदुत्व की विचारधारा की आलोचना व्यक्त की है। इस तरह वे छिछले बहानों और कारणों के जरिये डीयू के सिलेबस और पाठ्यक्रम से सभी आलोचनात्मक और उनसे इतर विचारों को ख़त्म करना चाहते हैं। यह साफ़ तौर पर धौंसबाजी और बदमाशी है। अकादमिक व्यवस्था में वे सब जो बहुलता और अनेकता की रक्षा करना चाहते हैं , इस कदम का जमकर मुकाबला करेंगे।
5. दलित राजनितिक दर्शन पर हमला जातिगत उत्पीड़न को नज़रअंदाज़ करने और भारतीय समाज की जातिगत गतिकी पर किसी भी अकादमिक पड़ताल को हतोत्साहित करने की हिंदुत्व की रणनीति के साथ पूरी तरह से तालमेल खाता है। SC-ST Atrocities Act पर प्रतिक्रियावादी विचार और रिजर्वेशन रोस्टर में बदलावों के जरिये आरक्षित वर्गों को उनके संवैधानिक हक़ों से मरहूम करने के बार-बार प्रयास कांचा इलैया जैसे आज के दौर के दलित चिंतकों पर नए हमलों के साथ जुड़े हुए हैं।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के अधिकारी इतनी आसानी से आरएसएस से जुड़े शिक्षकों की धौंस के सामने सर झुकाने को तैयार हैं। इन हमलों का प्रतिरोध मेरे जैसे चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा अकादमिक कौंसिल समेत सभी उपलब्ध मंचों पर किया जायेगा।

हम न तो ‘ दलित ‘ शब्द का इस्तेमाल बंद करेंगे और न ही कांचा इलैया के विचारों को बेदखल होने देंगे। दिल्ली विश्वविद्यालय पर आरएसएस के अकादमिक आतंकवाद के खिलाफ मैं डीयू के वाईस चांसलर और भारत के राष्ट्रपति – जो की विश्वविद्यालय के विजिटर भी हैं – दोनों को आधिकारिक पत्र लिखने जा रहा हूँ।

 

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