2019 के लोकसभा चुनाव और मज़दूर वर्ग की पार्टी :सुनंद

1. सीपीआई (एम) की केंद्रीय कमेटी ने लोक सभा चुनावों के मद्देनजर पार्टी के समक्ष तीन प्रमुख काम निर्धारित किये हैं : (१) भाजपा के गठबंधन को हराना ; (२) लोकसभा के भीतर सीपीआई (एम) और वामपंथ की ताकत को बढ़ाना ; और (३) ये सुनिश्चित करना की केंद्र में एक वैकल्पिक धर्मनिरपेक्ष सरकार बने।
यह समझ पिछली पार्टी कांग्रेस द्वारा स्वीकृत राजनितिक लाइन पर आधारित है।

2. देश का शासक वर्ग आज मजबूती के साथ हिंदुत्व और नवउदारवाद के साथ खड़ा है, क्यूंकि पूंजीवादी संकट के बीच उसकी स्पष्ट समझ है कि उसके वर्गीय हित यही राजनैतिक ढर्रा बेशर्मी, बर्बरता और आक्रामकता के साथ पूरी कर सकता है। शासक वर्ग की दूसरी राष्ट्रिय पार्टी यानिकि कांग्रेस भी यही साबित करने में लगी हुई है कि वह भी शासक वर्गों के वर्गीय हित पूरे करने में आरएसएस-भाजपा से किसी भी मामले में काम नहीं है। जहाँ भाजपा प्रोग्रामैटिक यानिकि कार्यक्रम के आधार पर हार्ड हिंदुत्व को लागू कर रही है , वहीँ कांग्रेस प्रेगमेटिक तौर पर यानि कि अपनी राजनितिक फायदे के हिसाब से सॉफ्ट हिंदुत्व को लागू कर रही है। इन दोनों राजनितिक दलों में फर्क वही है है जो एक चोर और डकैत के बीच होता है।

3. पूँजी के हित में और मज़दूरों के खिलाफ नीतियां अपनाई जा रही हैं तथा श्रम कानूनों में बदलाव किये जा रहे हैं। नौजवानों और किसानों से किये हर वादों को खुद ही जुमला साबित किया जा रहा है। शासक वर्गों को संकट से उबरने के लिए उन्हें जनता की गाढ़ी कमाई लेकर रफ्फूचक्कर होने का लाइसेंस दिया जा रहा है , जबकि संकट का बोझा मेहनतकशों पर ही डाला जा रहा है , जिनकी कमर पहले ही झुकी हुई है।

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4.बुर्जुआ जनवाद की संस्थाएं और इसके भीतर मौजूद नागरिक अधिकारों पर एक के बाद हमले मौजूदा निज़ाम में तेज़ हो रहे हैं। उन्मादियों का गिरोह केवल सौहार्द और शांति को ही नहीं भंग कर रहा है , वह मज़दूर वर्ग की एकता को भी भंग कर रहा है। जहाँ एक ओर नवउदारवाद मेहनतकशों समेत मध्यम वर्ग के व्यापक हिस्सों में भी एक के बाद हमले तेज़ कर रहा है , हिंदुत्व द्वारा बोतल से बाहर निकाले गए प्रेत इस एकता के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं। मेहनतकशों की जीविका पर जहाँ हमले अनवरत जारी हैं, वहीँ दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं पर भी हमले बदस्तूर जारी हैं। नवउदारवाद की लम्पट पूँजी समाज को लम्पट बनाती है , और यहाँ तो करैला और उस पर नीम चढ़ा की स्थिति है , जिस से भारतीय समाज का लम्पटीकरण आज अपने ऐतिहासिक स्तर पर जा पहुंचा है।

5. साफ़ है मज़दूर वर्ग की पार्टी के लिए आज इस हिंदुत्व-नवउदारवाद गठजोड़ को पीछे धकेलना सबसे प्रमुख कार्यभार है। और इसका मतलब साफ़ है कि इसके लिए इस गठजोड़ के राजनितिक प्रतिनिधि भाजपा को करारी शिकस्त देना वक़्त की मांग है।

6. पर, इतना भर नहीं। चुनावों में भाजपा को हराना तो है ही , साथ इसके परे वर्गीय आधार पर वैचारिक और राजनितिक स्तर पर इस गठजोड़ को धूल चटाने का काम है। और यह होगा आंदोलनों की गर्मी से। यह होगा बुनियादी वर्गों द्वारा पोस्ट-ट्रुथ के इस जमाने में शासक वर्गों के पोस्टर बॉयज की धींगा कुश्ती के परे हमारे समय का सच्चा नैरेटिव रचकर।

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7. 2019 निःसंदेह बेहद महत्वपूर्ण होने जा रहा है। आईये , हम अपने-अपने कार्यक्षेत्र , अपने-अपने इलाके में आंदोलनों की गर्मी और इसे राजनितिक आधारों में बदलकर यह सुनिश्चित करें की 2019 से नए रास्ते खुलें। बॉक्सिंग रिंग में सामने वाले को क्षण भर के लिए नीचे गिराकर निश्चिंत नहीं हुआ जाता , उस पर तब तक मुक्के बरसाए जाते हैं जब तक वह लहूलुहान होकर चित्त न हो जाये। 2019 में भाजपा को हराना हमारे प्रतिद्वंद्वी मुक्केबाज़ को बस क्षण भर के लिए नीचे गिरायेगा, उसे चित्त नहीं करेगा। आईये, उस मुक्केबाज़ को चित्त करने के लिए मुक्केबाज़ी के सारे तिकड़मों के लिए अपने आप को तैयार करें।

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